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ब्लॉग्स (163)
मुल्ला नसीरुद्दीन और चाबी
एक दिन हमारे मुल्लाजी रास्ते पर कुछ ढूँढ रहे थे। उन्हे देखकर वहाँ से गुजरनेवाले लोग पुछने लगे ' मुल्लाजी आखिर क्यां ढूँढ रहे है आप ? मुल्ला ने कहाँ 'में अपनी चाबी...
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janak zala
द्वारा 3 फ़रवरी, 2008 3:10 PM पर पोस्टेड
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मुल्ला नसीरुद्दिन और तीन बुद्धिजीवी
अब तीसरे बुद्धिजीवी की बारी थी यह व्यक्ति बहुत चालाक था। उसने मुल्ला के जवाब में से ही अपना सवाल ढूँढ लिया। उसने मुल्ला से कहाँ आप को गधो के बारे में अच्छी मालूमात है। अब जरा यह भी बता दिजीए की 'आपके गधे की पूँछ में कितने बाल है ?...
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janak zala
द्वारा 31 जनवरी, 2008 7:13 PM पर पोस्टेड
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गाँधी की हत्या के प्रत्यक्षदर्शी
'30 जनवरी का वह दिन आज भी मुझे याद है उस समय में हिंदुस्तान टाईम्स में काम कर रहाँ था और हमे हमारे संपादक ने इस घटनाक्रम कें बारे में...
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janak zala
द्वारा 30 जनवरी, 2008 2:27 PM पर पोस्टेड
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महात्मा को फाँसी ?
उनकी गलती सिर्फ इतनी थी की उन्होने रोशनी के ईलेक्ट्रीक तार को महात्माजी के गले में डाल दी बस फिर क्यां होना था। बस जन्म ले लिया एक नये विवाद ने...
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janak zala
द्वारा 27 जनवरी, 2008 3:19 PM पर पोस्टेड
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नसीरुद्दिन और चौकीदार
नसीरुद्दिन हमेशा अपने गध्धो के साथ एक नगर से दूसरे नगर में घुमा करते थे। कभी-कभी दूसरे नगर में प्रवेश करने में रात हो जाती थी। वह हमेशा अपने गध्धो पर कुछ घरेलू सामान लेकर जाते थे। चोर-लूटैरो से बचने के लिए वो हमेशा उस सामान के उपर सूखी घास रख देते थे जीससे...
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janak zala
द्वारा 25 जनवरी, 2008 12:40 PM पर पोस्टेड
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नसरुद्दीन और दुनिया का अंत
एक दिन हमारे मुल्ला नसीरुद्दिन के पास एक शख्स आया वह थोडा दुविधा मे था। उसे देख मुल्ला बोले, ' क्यां बात है तुम चिंतित क्यों हो' ? शख्स बोला ' मुल्लाजी में एक सवाल का जवाब नहीं ढूंढ पा रहा हुं...
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janak zala
द्वारा 24 जनवरी, 2008 12:46 PM पर पोस्टेड
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आखिर रामू क्या जाने राम को.....।
अभी एक ब्लॉग में स्व. रामानंद सागर के परिवार और धीरज कुमार के बारे में पढ़ा। हमारे एक भाई साहब ने उनके बारे में काफी कुछ लिखा है जिसमें प्रशंसा कम आपना आंतरिक रोष ज्यादा है।
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janak zala
द्वारा 23 जनवरी, 2008 4:46 PM पर पोस्टेड
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मुल्ला नसीरुद्दीन और चाँदी का सिक्का
एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन इतने गरीब हो गये कि उनको घर घर भटक के भीख मागने का समय आ गया। मुल्ला का बडी मुश्किल से पेट भरता था....
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janak zala
द्वारा 22 जनवरी, 2008 5:39 PM पर पोस्टेड
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'रामायण' रिटर्न्स
20 साल पहले रविवार के दिन सभी शहरों और गाँवों में लोग अपना सारा काम छोड़कर इडियट बॉक्स (टीवी) के सामने बैठ जाते थे, क्योंकि उनका पसंदीदा धारावाहिक 'रामायण' प्रसारित होता था। रामानंद सागर के इस पौराणिक धारावाहिक ने उस समय सफलता के तमाम परचम लहराए थे और लोगों के दिलों पर राज...
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janak zala
द्वारा 21 जनवरी, 2008 4:23 PM पर पोस्टेड
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मैंने ऐसा तो कुछ गलत नहीं कहा था कि तुम सब के सामने मुझे डाँटने लगे। तुम नहीं जानते मेरे दिल पर क्या बीत रही है। हर बार तुम अपने प्यार का वास्ता दे देते हो। हर बार तुम ही कहते रहते हो कि...
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janak zala
द्वारा 17 जनवरी, 2008 2:34 PM पर पोस्टेड
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' द वन वु केअर मोस्ट '
' द वन वु केअर मोस्ट ' यहीं विषय था उस प्रतियोगिता का जीसमे सभी प्रतिभागियो ने भाग लिया। इन प्रतिभागियो में एक छोटा प्रतिभागी भी था जिसकी उमर सिर्फ दस साल की थी और यहीं बच्चा स्पर्धा में विजयी हुआ। आखिर उसने एसा क्यां किया जो उसे ईनाम मिला ?
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janak zala
द्वारा 17 जनवरी, 2008 12:25 PM पर पोस्टेड
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वाह रे....तेरी नैनो के नखरे....
हम- तुम हम : अरे तुम आज तुम बडे. ही खुश दिख रहे हो...कुछ खास बात है क्यां ? तुम : हा में नन्ने को अरे सोरी 'नैनो' को खरीदने जा रहा हु...
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janak zala
द्वारा 11 जनवरी, 2008 2:24 PM पर पोस्टेड
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'नैनो का सपना' या फिर सपनो की 'नैनो'
नैनो में सपना, सपना में सजना, सजना पे दिल आ गया कि सजना पे दिल आ गया ' ' लेकिन यहाँ पर तो सजना पर नहीं बल्कि नैनो पर ही सब का दिल आ गया है। जी हाँ यहाँ पर हम किसी के कजरारे नैनो की बात...
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janak zala
द्वारा 10 जनवरी, 2008 6:37 PM पर पोस्टेड
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