जाने माने कालमिस्ट भी अब इस फिल्म के बारे में अखबारों में उलटा पुलटा लिखकर सुर्खियों मे आने लगे हैं लेकिन अफसोस ऐसे ज्ञानी लेखक भी इस फिल्म को एक फिल्म की तरह न लेकर उसे भारतीय जीवन के पहलूओं से जोड़ रहे हैं।
कोई कहता है कि इस फिल्म में भारत की गरीबी का मजाक उडाया गया है। अब पूरे देश को मालूम पड़ जाएगा कि भारत में कितने गरीब लोग हैं ? क्या फर्क पड़ता है अगर पूरी दुनिया जान भी ले कि भारत में लाखों की तादाद में गरीब हैं । जो सत्य है उसे आप कभी भी छुपा नहीं सकते है।
अगर आज आपके शरीर का कोई अंग खराब हो जाए या फिर आप अंधे हो जाए तो क्या आप अपनी एक आँख पर हाथ रखकर घूमते रहोगे ताकि दुनिया जान न पाए की आप अंधे है । विदेश में बसने वाले लोग अगर अपनी एक आँख से भारत की झुग्गियों को देख सकते है तो उनकी दूसरी आँख यहां बढते शॉपिंग मॉल्स और गगनचूंबी इमारतों से किनारा नहीं कर सकती। यही वास्तविक सत्य है ।
सदी के महानायक भी इस बात से खफा हैं जिन्होने खुद गरीबी के विषय पर आधारित कई फिल्मो में काम किया है। उनका कहना कि यह फिल्म भारत को third world dirty underbelly के तौर पर पेश करती है।
मैं खुद अभिताभ जी का फैन हुँ इसलिए जानता हूँ कि खुद बिग-बी ने 'सौदागर' फिल्म में एक गुडवाले गरीब शख्स की भूमिका निभाई थी और तो और फिल्म 'मैं आजाद हूँ' में उनका एक सीन ऐसा भी है जब वह रास्ते में पडा एक सेब सबकी नजर चुराते हुए उठा लेते है और फिर उसे खाते हैं क्या यह गरीबी और भूखमरी नहीं दिखाती ?
अब बिग-बी को यह बात समझ में आ गई है इसलिए तो उन्होने इस मुद्दे पर यू-टर्न ले लिया है और इस मुद्दे को लेकर पूरा दोष उन शख्सों पर मढ़ दिया, जिन्होंने उनके ब्लॉग पर टिप्पणियां दी हैं, बिग बी कहते हैं कि उन्होंने तो केवल एक बहस के रूप पर फिल्म के बारे में लिखा था.
भारत में ऐसी ढेर सारी फिल्म हैं जो गरीबी-भूखमरी और दंगो को पेश करती है। 'दो बीधा जमीन', 'मदर इंडिया', 'रोटी' या फिर स
यहा पर हम लोग विरोध का झंडा नही लहराते क्योंकि यह सभी फिल्मे भारत में बनी है उसे बनाने वाला निर्माता कोई विदेशी नहीं बल्कि भारतीय है ? यहां पर डैनी बोयले नहीं है बल्कि भारत में जन्मा हुआ वह शख्स है जिसने इस फिल्म का निर्माण किया है। अगर स्लमडॉग के लिए प्रसिद्ध संगीतकार ऐ.आर. रहमान को गोल्डन ग्लोब अवार्ड न मिलता तो क्या यह फिल्म चर्चा का विषय बनती ? इस फिल्म के कारण ही आज रहमान विश्व में अपनी पहचान बनाने में सफल हो पाए है।
इस फिल्म के कारण ही आज भारतीय लेखक विकास स्वरूप की पुस्तक 'क्यू एन्ड ए' विश्व की लाईब्रेरी में पढ़ी जा रही है वरना विकास स्वरूप के बारे में तो हिंदुस्तान में चर्चा भी नहीं हुई थी ? अब तक उनकी किताब ज्यादातर हिन्दुस्तानियों के लिए जंगल में नाचे मोर की भांति थी.
हमें तो इस फिल्म के लिए गर्व होना चाहिए उसे सिर्फ मनोरंजन के तौर पर लेना चाहिए न कि कोई सामाजिक डॉक्युमेंट्री की तरह ? क्योंकि अगर यह फिल्म ऑस्कर जीतने में सफल रही तो पूरी दुनिया में भारत छा जाएगा क्योंकि फिल्म की अभिनय ब्रिगेड (स्टारकास्टिंग) हिंदुस्तानी है.
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