खुदा के घर भी ना जाएँगे बीन बुलावे के ''
जब लोग उससे पूछते थे कि मियाँ अब खुदा के दरबार में कब रुखसत करोगे तब 138 साल का यह नौजवान (हम उसे बुढ़ा कभी भी नहीं कह सकते) हमेशा यही बात करता था...
सफेद दाढ़ी और सफेद टोपी पहनकर जब कभी भी वह जयपुर की गलियों से निकलता था तब अच्छे खासे नौजवान भी अपने दाँतोँ तले अँगुली दबाए खड़े के खड़े रह जाते थे..
दोस्तो..में बात कर रहा हूँ अल्लाह के उस पाक बंदे की जिसने 138 साल तक इस दुनिया पर राज किया.. मैं बात कर रहा हूँ रहीम खाँ उर्फ हबीब मियाँ की...
देश के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति कहे जाने वाले हबीब मियाँ आज हमारे बीच में मौजूद नही है.. सोमवार रात को जयपुर की एसएमएस अस्पताल में उन्होंने हम सबसे नाता तोड़कर जन्नत की राह पकड़ी.
राजस्थान के जयपुर शहर में करीबन 20 मई 1869 में जन्म लेने वाले हबीब मियाँ शायद दुनिया के सबसे पहले खुश नसीब शख्स होंगे जिन्होने अपनी छह पुस्तो को अपने सामने खेलते देखा...लेकिन अफसोस उनमे सें उनकी अपनी संतान एक भी नही थी...
हबीब मियाँ ने 50 वर्ष की आयु में अपनी आँखो की रोशनी गवाँ दी थी... सिर्फ अपनी आँखो को छोड़कर इतनी उम्र में भी मियाँ का शरीर पूरी तरह स्वस्थ रहा...
मियाँ हमेशा कहते थे कि ' आप इसे खुदा का चमत्कार ही समझो...वरना आहार के विषय में मेंने कभी भी कोई परहेज नही रखा..मुझे चाय बहुत पसंद है और मैं दिन में न जाने कितनी बार चाय पीता रहता हूँ..''
पीछले साल जयपुर म्युनिसिपल कार्पोरेशन की अगुवाई में हबीब मियाँ के 137 में जन्मदिन की पार्टी का आयोजन किया गया था... उस दिन उन्होंने अपने सभी पौते-पोतियों के सामने केक काटी थी....
अपनी आयु के बारे में पत्रकारों के द्रारा पुछे गये सवालो के बारे में उन्होंने हसते हुए सिर्फ इतना ही कहा था कि ' एक संसार आ गया और एक चला गया लेकिन लगता है शायद भगवान मुझे भूल गए है'
उम्र संबंधित विवाद
हबीब मियाँ के साथ भी एक विवाद आजीवन जुड़ा रहा...यह विवाद उनकी उम्र को लेकर था... उनकी सही उम्र का प्रमाण अभी तक नहीं मिल पाया है..
लिम्का बुक ऑफ ने तो उन्हें सबसे वृद्ध शख्स का खिताब दे दिया लेकिन गिनिस बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड और संशोधको ने कभी भी मियाँ की सही उम्र की जानकारी प्राप्त करने में अपनी रुचि नहीं दिखाई...
शायद मियाँ खुद भी अपनी सही उम्र नही जानते थे इसलिए तो उन्होंने अपने पूरे जीवन में तीन बार अपनी जन्म तिथि अलग अलग सालो में बताई और यह साल 1869, 1872 और 1878 थे.. आखिर में आधिकारिक दस्तावेजो के रिकॉर्ड में शामिल जन्मतिथि को ही मान्य रखा गया...वह दुनिया के शायद पहले पेन्शनर भी थे जिन्हे वर्ष 1938 से ही पेंशन मिलनी शुरू हो गई थी...
दाताओ ने हज की यात्रा करवाई
मियाँ का परिवार इतना रईस नहीं था कि वह उनको हज की यात्रा करवा सके....लेकिन शायद खुदा हर पल मियाँ के करीब था..उन्होने कुछ ऎसे बंदो को घरती पर भेजा जिन्होनें दानवीर बनकर मियाँ की हज यात्रा का जिम्मा अपने सर पर उठाया... वर्ष 2004 में हबीब मियाँ दाताओं की आर्थिक सहाय से मिलने वाली रकम के जरिए हज की पाक यात्रा पर गये..
एक मात्र तुरही बजाने शोख
हबीब मियाँ को तुरई बजाने का बहुत शोख था...अपनी जवानी के समय में वह जयपुर पेलेस के रोयल बेन्ड में तुरही बजाते थे.
दोस्तों परवरदिगार हमे भी हमारे हबीब मियाँ जेसी उम्र बक्क्षे और अल्लाह ताला मियाँ साहब को जन्नत नसीब कराए...यही हमारी दिलि तमन्ना है..
आखिर में कुरान के एक फरमान के साथ में भी रुखसत चाहूँगा ''बुरे कामों से रोकना और अच्छे कामों का हुक्म करना ही तुम्हारा काम है...इसीलिए तुम बेहतरीन उम्मत हो..
अल्लाह हाफिज.....दोस्तो.
(आर्टिकल के बारे में अपनी प्रतिक्रिया अवश्य भैजे... जनक नाम तो याद रहेगा शायद )
लोड हो रहा है...
प्रतिक्रियाएँ