' क्यों ? '
' स्टेशन पर बम फटेंगे और घायल एकाद घंटे में अस्पताल पहुँच जाएंगे और वहा फिर एक बड़ा धमाका होगा जिसमें एक साथ सभी मर जाएंगे..'
रामगोपाल वर्मा की हालिया रिलीज फिल्म 'कोंट्रेक्ट' का यह संवाद है जिससे प्रेरणा लेकर दहेशतगर्दो ने शनिवार को अहमदाबाद में आतंक मचाया...

अहमदावाद में शनिवार को एक के बाद एक करके 16 बम धमाके हुए...इन धमाको के बीच एक ऎसा धमाका भी था जिसने इंसानियत को पूरी तरह शर्मसार कर दिया...
सिविल अस्पताल में हुए जबरदस्त बम धमाके ने एक साथ 25 लोगो की जान ले ली और सिर्फ 36 मिनट के भीतर रील लाईफ की यह घटना रियल घटना में परिवर्तित हो गई...
अब सवाल यह खड़ा होता है कि क्यां आतंकवादीओ ने सचमुच ही किसी फिल्म से प्रेरित होकर इस घटना को अंजाम दिया होगा...
हमारे यहाँ आतंकवाद से प्रेरित कई फिल्मो का निर्माण हो चूका है... बोम्बे, रोजा, दिल से..,फना, 16 दिसम्बर, सरफरोश, फिजा, डी कंपनी, धोखा, ब्लेक एंड व्हाईट और हाल ही रिलिज हुई फिल्म कोंट्रेक्ट ऎसी और भी कई फिल्मे है जिसमें आंतकवाद के काले साये को लोगो के सामने पेश किया गया है...
इस प्रकार कि फिल्मो में कभी कभी तो एक आंतकवादी को हिरो के रूप में पेश किया जाता है...फिल्मे कभी कभी हमे यह भी दिखाती है कि किस प्रकार कोई गंभीर से गंभीर घटना को अंजाम दिया जा सकता है...परिणाम स्वरूप जो बच्चे आतंकवाद का अर्थ भी नहीं जानते कभी-कभी वही इस घटना के शिकार बन जाते है...
तो क्यां बोलिवुड को इस प्रकार की फिल्मो का निर्माण बंध कर देना चाहिए ? क्यां हमे इस प्रकार की फिल्मे देखना बंध कर देना चाहिए ? क्यां सेंसर बोर्ड और सरकार को भी इस प्रकार की फिल्मो पर कोई रोक लगानी चाहिए ? ऎसे कहीं सवाल आज हमारे बीच में है जिसका जवाब ढूँढना शायद नामुमकिन है...
यहाँ
पर खास तौर पर में राम गोपाल वर्माजी का उल्लेख करना चाँहूंगा... वर्मा एक अनुभवी निर्देशक है जिनकी आंतकवाद पर फिल्म बनाने पर विशेष पकड़ है... उन्होने आंतकवाद और गुंडागिरी से प्रेरित सत्या, जंगल, कंपनी, सरकार, सरकार राज और कोंट्रेक्ट जैसी फिल्मो का निर्माण किया है...शायद उनकी फिल्म 'कोंट्रेक्ट' सें ही प्रेरणा लेकर अहमदाबाद की घटना को अंजाम दिया गया है ऎसी कई बात आज मीड़िया में चर्चित हो रही है.. लेकिन रामू इस बात का पूरी तरह खंडन करते है..वह कहते है कि उनकी फिल्मे समाज की छबि धुमिल करने का नहीं बल्कि लोगो के मनोरंजन का काम करती है..
रही बात फिल्म 'कोंट्रेक्ट' के उस संवाद कि जो इतफाक से रील लाईफ में से रियल लाईफ में परिवर्तित हो गया... इस मुद्दे पर फिल्म 'कोंट्रेक्ट' के पटकथा लेखक प्रशांत पांड़े का कहना है कि 'सच में यह बहुत दु:ख की बात है कि लोग इस फिल्म और मेरे संवादो को अहमदाबाद की घटना के पीछे जोड़ रहे है.. ...
'दरअसल इस संवाद का विचार मुझे वर्ष 2004 में फोरेन न्युज पेपर में छपे एक आर्टीकल से आया था. उस साल जनवरी में इसराइली सैना ने फिलिस्तीन अस्पताल पर बम हमला किया था जिसमे 19 लोगो की जान गई थी.. हमलावर पकड़ा नहीं गया... मैंने उस घटना से प्रेरित होकर यह संवाद लिखा है'
खैर रामू और प्रशांत ने तो कोई ना कोई बहाना कर के तमाम आरोपो से अपना बचाव कर लिया लेकिन उन लोगो का क्यां जो इस दुर्घटना के शिकार हुए और जो मौत से बच नहीं सके.. ...
दोस्तो आप को क्यां लगता है इस समग्र घटनाक्रम के पीछे बोलीवुड की आतंकवाद से प्रेरित फिल्मे जिम्मेदार है...अगर है तो क्यां हमे इस फिल्मो का सामूहिक बहिष्कार करना चाहिए ?
क्यां सेंसर बोर्ड और सरकार को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना चाहिए ? अपनी प्रतिक्रिया अवश्य भेजे...कृपया हिंदी सुधारके पढ़े... जनक नाम तो याद रहेगा शायद ...

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