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आसाराम की आखिरी आस

अरे यह क्या ? अहमदाबाद शहर तो आग में झुलस रहा है... लाल रंग की आग की लपटों के बीच में यह श्वेत वस्त्रधारी लोग कौन हैं ? अरे भई यह तो आसाराम बापू के समर्थकों के लिबास में छुपे कुछ गुंडे हैं.. लेकिन उनके हाथों में तलवारें क्यों हैं? वे कौन सा युद्ध लड़ने जा रहे हैं ? उनकी आँखों में रक्त क्यों उतरा हुआ है ? उनके मन में कौन सी क्रोध की ज्वाला भड़क रही है?

इसके पिछे केवल एक कारण है.. मीडिया और उसका भ्रमित करने वाला प्रचार... हां, मीडिया के कारण ही आज बापू के समर्थक गुस्से में हैं. आखिर यह सब माजरा क्या है मेरे भाई ?

अरे भैया हम बताते पूरी राम कहानी...बात कुछ ऐसी है कि गत तीन तारीख को बापू के आश्रम के दो लड़के दिपेश और अभिषेक अचानक गुम हो गए. अगले दिन उनके शव नदी के पट से मिले. प्रशासन का मानना था कि नदी में डूबने से उनकी मौत हुई. लेकिन मृतक बच्चों के माता-पिता यह बात मानने के लिए कताही तैयार ही नहीं थे. उनका मानना था कि उनके बेटे को हत्या की गई है.

देर-सवेर यह बात हमारे मीडिया तक पहुँची. मीडिया ने इस खबर में अपनी तरफ से थोड़ा छौंक डाल दिया. इस समग्र घटनाक्रम के पीछे बापू और उनके आश्रम के साधको को जिम्मेदार ठहराया गया. फिर क्या होना था हम सब जानते हैं.. बापू के साधको का गुस्सा फुट फुट कर बहार निकलने लगा...

कहते हैं ना 'गुरु ऐसा चाहिए जो शिष्य से कुछ न ले... और शिष्य ऐसा चाहिए जो गुरु को सब कुछ दे... यहां भी आसाराम को अपने साधकों से पूरा सहयोग मिला. लेकिन उनके विरोधियों ने आग में घी डालने के लिए पूरे पूरे प्रयत्न किए.

गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व पर आसाराम की जय-जयकार होने के बदले उनके विरोधी उनके विरुद्ध सुत्र्त्रोच्चार करने लगे... गुरु के साधकों और साधकों के वेश में छिपे कुछेक असामाजिक तत्व को यह बात भला कैसे गवारा होती.. वह तो हाथ में जो भी हथियार आया उसे लेकर रास्तों पर निकल पडे... देखते ही देखते पूरा अहमदाबाद एक युद्ध के मैदान में तब्दील हो गया. इस युद्ध के मैदान के दृश्यों को लोगों तक पहुंचाने वाले मीडिया की भी प्रदर्शनकारियों ने खूब धुनाई की.

घटना को देखकर पुलिस भी आ गई... उन्होने दोनो पक्ष को रोकने का पूरा प्रयास किया... आंसू गैस छोड़ी एवं लाठीचार्ज किया गया. और अंत में थक हारकर पुलिस ने गोलीबारी भी की लेकिन तब तक बहुत देर हो चूकी थी...आधा अहमदाबाद आग की लपटों में समा चूका था. कई सारी बसें और कारों को आग के हवाले कर दिया गया था. कई लोग घायल हुए..उसमे गुरु के साधक भी थे और विरोधी भी.


शायद आसाराम इस घटना से पूरे वाकिफ थे...इस लिए उन्होंने एक बार मृतक बच्चो के परिजनों से मिलने का सोचा. बापू उन्हें अपनी सहानुभूति देने भी पहुंचे...

लेकिन वहाँ भी विरोधी का काफिला पहुँच गया. बापू को आए सिर्फ तीन-चार मिनट ही हुए होंगे. तब तक तो उन्होने बापू जिस गद्दी पर बैठे थे. उस गद्दी को ही जला दिया. उनके समर्थको को मारा गया...

बापू ने सिर्फ इतना कहा '' वो तो मृतक बच्चों के परिजनों से मिलने आए थे और देखते ही देखते यहा क्या हो गया. शायद मेरे विरुद्ध गलत बातें लोगों के सामने प्रकाशित की जा रही है. मुझे गुजरात की न्यायप्रणाली पर पूरा भरोसा है और यहीं मेरी आखिरी आस है.इस घटना में मेरा बिलकुल भी हाथ नहीं.

दूसरी तरफ बच्चो के माता-पिता कह रहे है कि उनके बेटों की हत्या की गई... कौन सही है और कौन गलत वो तो आनेवाला समय ही बताएगा..खैर अभी तो मे सिर्फ इतना कहना चाहूगा..''जय गुरुदेव''

( लेख के बारे में अपनी प्रतिक्रिया अवश्य भेजे...जनक..नाम तो याद रहेगा शायद )
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