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इंदौर दंगे, जनु की जुबानी

पीछले दो साल से इंदौर में ही हुँ...आखिर मेरे जैसे समजदार, और सहनशील, कर्तव्यनिष्ठ, इमानदार (आगे की तारीफ मेरे उपरी अधिकारी से जनवरी से लेकर जुन माह के बीच सुन लिजयेगा) .. आदमी को इंदौर ने ही तो पनाह दी है...लेकिन यह क्यां इंदौर का तो माहौल ही बदला हुआ है... भई यहाँ पर तो दंगे हो गए...

हाँ तो मे क्यां कह रहाँ था...याद आ गयाँ... में अपनी माताजी को हरिद्वार के दर्शन करवाने ले गया था.... वापस आया तो मालूम हुआ की इंदौर में तो दंगे हो गए है... रेलवे स्टेशन पर हम जैसी ही उतरे की मेरी मा डर के मारे बेहाल हो गई.....

हरिद्वार के मंदिरो में उन्होने जिन जिन पुजारीऔ के पैर छुकर आर्शिवाद लिए थे...ऎसे ही कुछ पुजारीओ को यहाँ की पुलिस डंडे मार रही थी...उनका दोष सिर्फ इतना था कि वह सुबह सुबह मंदिर से लौट रहे थे '' ...

जैसे तैसे हमने ऑटो पकड ने की सौची... लेकिन यह क्यां स्टेशन से टेलिफोन नगर का किराया... 150... 200...300 रुपिया...

भैया आप इतना किराया क्यों ले रहे हो ?

ऑटो वाला सिर्फ इतना बोला '' बस हमारी मरजी''...


ओटो रिक्शा डरी डरी सी चल रही थी... माँ के आसपास सामान ही सामान था...क्योंकि उसने मेरे चाँचा...चाँचा की भाँजी...मामा के भाई...मोसी के भतीजो के लिए...रुदाक्ष की मालाए... भगवान की छबीया...आग्रा के पेठे, मथुरा के पेडे, गंगा जल, यमुना जल न जाने क्यां क्यां खरीदकर भर रखा था.. ...

हमने सौचा था कि घर जाकर सब को हरिद्रार का प्रसाद बाटेंगे...लेकिन पुलिस को भी कुछ ज्यादा जल्दी थी... जो उन्होने हमसे पहले ही डंडे बरसाकर लोगो को प्रसाद बाँटना शुरु कर दिया...प्रसाद खाने वाले भी मन लगाकर खा रहे थे..और कह रहे थे.. बस अब नहीं चाँहिए इतना काफी है.. ...

माँ को घर छोडकर में सीधा ऑफिस पहुँचा...कर्फ्यू तो बहुत छोटी बात थी... अगर भूचाल भी आ गया होता तो भी मुझे आफिस जाना ही जाना था...उसके प्रमुख दो कारन थे..पहला यह कि अगर नहीँ जाता तो पैसे कट जाते और दूसरा मेने हमेशा से मेरा भला चाहने वाले मेरे उपरी अधिकारी को समय पर हाजिर होने का वादा जो किया था...और राजपूत मरकर भी अपना वादा निभाते है... खैर में तो अभी जिंदा हूँ.. ...

वैसे भी पुलिस मेरा कुछ नहीँ बिगाड शकती... क्योंकि मेरे पास प्रेस कार्ड जो है... वो वात अलग है कि वह मेरे प्रेस का नहीं है... .. लेकिन उसमे क्यां हुआ कार्ड तो कार्ड होता है... चाँहे जिसका भी हो...मेने उसे अपनी गाडी के पीछे बडे अक्षरो में बनवाकर खुद ही चिपका दिया है...ताकि जिन पुलिस वालो को दूर की नजर के ऎनक हो वह भी उसे ठीक से देख शके'' ...

मेने कहाँ ना कि मे गुजराती हुँ...इसलिए हर काम सौच समजकर करता हुँ...मेने सौचा कि शायद पुलिस वाला अनपढ हो इस लिए उसको यकीन दिलवाने के लिए दो-तीन दूसरे कार्ड भी अपने जेब में रखे है..जिनमें महात्मा गाँधी की फोटो भी है जिसे देखकर कोई भी पुलिस वाला मुझे गांधीवादी समजकर छोड दे '' ...

आज मेने अपनी जेब में कोई पेन नहीँ रखा...मेरी पूरी कमीज पर प्रेस कार्ड लगे हुए है... ताकि में एक कर्तव्यनिष्ठ ईंसान दिख शकु..... ..

लेकिन यह क्यां मेरे एक परम मित्र को तो कार्ड रखने पर भी पुलिस के डंडे खाने पडे..

मेने कहाँ भैया...तुमने कार्ड रखा था तो पुलिस ने क्यों मारा

उसने कहाँ... भैया मेरा तो नसीब ही खराब है...मेने उस पुलिस वाले को अपना कार्ड भी दिखाया था...लेकिन शायद उस पुलिस वाले का पीछली रात अपनी पत्नी से झगडा हो गया था... उसने मेरी सुनी ही नही... बस मारता गया...मारता गया......


वह तो मारते मारते बोल रहाँ था...तु प्रेस वाला हुआ तो क्याँ हुआ...हम कल रात से यहाँ जाग रहे है..और तु चैन से शहर में घूम रहाँ है...यह तो बहुत नाइन्साफी है...ठाकुर...आखिर किसी को तो हमे मारना पडेगा ही..चल तु ही सही...

बैचारे मेरे भैया आज आफिस आए... उनके पास कुछ दवाइया भी थी... उनको मेरी तरह शरदी या सरदर्द नहीं था...बस यह कुछ ऎसी दवाई थी जिससे बदन की पीडा कुछ कम हो शके...

यार शुरु शुरु में तो मुझे भी घर जाने में डर लगा....लेकिन में यह सौचकर अपने मन को मना लेता हुँ कि वैसे भी मेरा वजन कुछ ज्यादा नहीं है...शायद कोई पुलिसवाला मेरी कद काठी देखकर ही मुझे छोड दे.. शायद वह सौचे यार इसे मारकर क्याँ फायदा...मारना हो तो कोई ' हठ्ठे कट्टे' को ही मारे......

(यह कथा सिर्फ एक व्यंग कथा है...यह कोई व्यक्ति विशेष पर केंद्रित नहीं... कृपया इसे मुक्त मन से पढे और अपने विचार- प्रतिक्रिया मुझे अवश्य भेजे...जनक... नाम तो याद रहेंगा शायद )

प्रतिक्रियाएँ

Re: इंदौर दंगे, जनु की जुबानी
वाकई बहूत खूब चित्रण किया। गुजराती हो उपर से ठाकुर याने करेला और...तुम्हारी यही बात तो हमें पसंद है ठाकुर।
Re: इंदौर दंगे, जनु की जुबानी
जनक भाई..... सही बात कहू तो व्यंग्य मे ही जीवन की सच्चाई को पेश किया जाता है.... मतलब की कोई दवाई इतनी कडवी होती है कि हम उस दवाई को शहद के साथ मिलाकर खाते है... वैसा ही व्यंग मे भी होता है... जीवन की सच्चाई को व्यंग्य के रूप मे हम पेश करते है....
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