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7 जुलाई, 2008


ब्लॉग्स (2)
पीछले दो साल से इंदौर में ही हुँ...आखिर मेरे जैसे समजदार, और सहनशील, कर्तव्यनिष्ठ, इमानदार (आगे की तारीफ मेरे उपरी अधिकारी से जनवरी से लेकर जुन माह के बीच सुन लिजयेगा) .. आदमी को इंदौर ने ही तो पनाह दी है...लेकिन यह क्यां इंदौर का तो माहौल ही बदला हुआ ... आगे पढ़ें...

गाँव के उस किसान के पास कहीं सारे पिल्ले थे... उसने उस पिल्लो को बेचने का सौचा...उसके लिए उसने एक बडा लकडी का बोर्ड बनवाया...जिस पर लिखा था... पिल्ले यहाँ से मिलेंगे. दिन ढल जाने तक कोई भी शख्स पिल्ले खरीदने नहीं आया... किसान बहुत निराश होकर खडा ... आगे पढ़ें...