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चार पत्नीयाँ

यह बहुत पूरानी कथा है...किसी एक नगर में एक मुस्लिम व्यापारी रहता था... उसकी चार पत्नी थी... लेकिन व्यापारी अपने चौथे क्रम की पत्नी को बहुत ज्यादा प्यार करता था..वह उसे अच्छी पौशाक और गहने खरीद कर ला देता...वह उसका बहुत ख्याल रखता था...

उसे अपनी तीसरे नंबर की पत्नी से भी प्यार था... व्पापारी को इस औरत के उपर गर्व था...

वह हमेशा दोस्तो के सामने अपनी इस पत्नी को लेकर ही जाता था...

उसे मनोमन यह भी डर था कि उसकी यह पत्नी कभी ना कभी उसे छोडकर किसी और मर्द के साथ भाग शकती है...


दूसरे नंबर की पत्नी भी उसे बहुत प्यारी थी.... वह हमेशा दूसरो के बारे में सोचती थी... हमेशा धैर्य से काम लेती थी...वह उस व्यापारी की परम मित्र भी थी... जब भी उस व्यापारी को कोई मुश्किल या परेशानी आती तब वह उसके पास आता था..और वह भी उस समस्या का समाधान करने में व्यापारी की मदद करती थी...

अब बात करते है उस व्यापारी की प्रथम पत्नी के बारे में.... वह पतिव्रता स्त्री थी... व्यापारी आज जिस मुकाम पर पहुँचा था उसमें उस औरत का बडा योगदान था.. वह घर का भी खयाल रखती थी.. व्यापारी उसे बिलकुल भी प्यार नहीं करता था...लेकिन वह अपने पति को जान से भी ज्यादा प्यार करती थी....


एक दिन इस व्यापारी को गंभीर बीमारी ने जकड लिया... वह समझ गया था कि अब वह लम्बे समय तक जीने वाला नहीं है... उसने एक पल के लिए अपने विलासी जीवन के बारे में सौचा और अपने आप को ही एक सवाल किया '' आज मेरे पास चार पत्नी है..लेकिन जब मे मर जाउंगा तब मेरे पास एक भी नहीं रहेगी.. में कितना अकेला पड जाउंगा क्यो ना मे अपने साथ अपनी पत्नीयो को भी ले जाउ ? ''

इसलिए उसने अपनी चाँरो पत्नीयो को अपने पास बुलाया...


उसने चौथी पत्नी से कहाँ '' में सबसे ज्यादा तुम्हे चाँहता हुँ.. मेने हमेशा तुम्हारे पहेनावे और खान-पान का पूरा ध्यान रखा है...अब में मर रहाँ हुँ... क्यां तुम मेरा साथ दे सकती हो... ?

'' नहीँ... इतना कहकर वह घर छोडकर भाग गई...

उसके यह शब्द एक तीर की भाति व्पापारी के सीने को छल्ली करके नीकल गए ...

कुछ सौच विचारकर दु:खी मन से उसने अपनी तीसरी पत्नी से कहाँ '' मेने जीवन भर तुम्हे प्यार किया...अब में मर रहाँ हुँ..मे चाँहता हुँ कि तुम भी मेरे साथ चलो... क्यां तुम मेरे साथ चलोंगी ? ''

''नहीं''... ' में आपके साथ केसे आ सकती हुँ...यहाँ की जिंदगी बहुत ही रंगीन है... जब आप मर जाओंगे तब में आप के ही किसी रहीश दोस्त से शादी कर लुंगी.''

व्पापारी का दिल कुछ पल के लिए बिलकुल ठंडा पड गया...


फिर भी उसने हिम्मत करके अपनी दूसरी पत्नी से पुछ डाला '' में हमेशा तुम्हारे पास मदद के लिए आया...और हर पल तुमने मेरी मदद की... आज मुझे फिर से तुम्हारी मदद चाहिए.. जब में मर जाउंगा तब क्यां तुम मेरे साथ चलोगी ?

''कृपया मुझे माफ ही कर दे..इस बार में आपकी कोई भी मदद नहीं कर शकती..हाँ आपकी लाश को क्रब तक पहुंचाने में मे आपका पूरा सहयोग दूंगी...लेकिन आपके साथ आने की बात को तो यहीँ पर छोड दे.''

बेचारे व्पापारी को समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह क्यां हो रहा है... यह वही औरते है जो कभी उसके साथ जीने-मरने की कसमे खाया करती थी...

अचानक सामने से आवाज आई... 'में आपके साथ रहने के लिए तैयार हुँ .. में चलने के लिए तैयार हुँ जहाँ कहीं भी आप जा रहे हो...

व्पापारी ने थोडी नजर उपर कर के देखा... वहाँ पर उसकी प्रथम पत्नी खडी थी... पूरा खाना न मिलने के कारन वह बहुत पतली हो गई थी... व्पापारी नें कहाँ '' मेने जीवन भर तुम्हे बहुत दु:ख दिया और आज तुम्ही मेरे साथ चलने के लिए तैयार हो गई.. शायद मुझे तुम्हारा सबसे ज्यादा ख्याल रखना चाहिए था...


जनु की झुबानी

देखा जाए तो उस व्यापारी की तरह हमारे जीवन में भी चार पत्नीया है...आप सोच रहे होगे कि जनक यह क्यां बोल रहाँ है... तो खुद ही समज ले...

चौथे क्रम की पत्नी हमारा शरीर है... हमे खुद को भी मालूम नहीं रहता कि उसको सजने-सँवारने में हमने जीवन के कितने हसीन पल गँवा दिए है.. लेकिन अंत में वही हमारा साथ छोड देता है...


तीसरे क्रम की पत्नी ? हमारी संपत्ति और रुतवा है.. जब हम मर जाते है..तब वह किसी और के पास चली जाती है...


दूसरे क्रम की पत्नी हमारा परिवार और मित्र है... उसमें कोई और मत नहीं कि जब तक हम जीवित है... तब तक वो हमारे मददगार बनकर रहते है...लेकिन जब हम मर जाते है..तब वह मुश्किल से हमारी अंत्येष्ठि में हाजिर होने का समय निकाल पाते है..



और हमारी प्रथम पत्नी ?

हमारी प्रथम पत्नी हमारी आत्मा है... जिसको हमने कभी भी प्यार नहीँ किया... जिसको हमने कुछ भी नहीं दिया... लेकिन आखिर में वही हमारा साथ देने के लिए तैयार होती है...

इसलिए दोस्तो अपनी आत्मा का सम्मान करो...क्योंकि हम जहाँ भी जाएँगे वहाँ वो हमारे साथ आएँगी... 'मे कौन हुँ' यह जान लेना ही आत्मा का सम्मान है..


( दोस्तो आपको यह प्रेरणास्पद कथा कैसी लगी...मुझे अपनी प्रतिक्रिया अवश्य भेजे...फिलहाल जनु का आठ दिनो तक अवकाश रहेगा...आठ दिनो के बाद फिर से मिलेगे... तब तक नाम तो याद रहेगा शायद )

प्रतिक्रियाएँ

Re: चार पत्नीयाँ
बहुत बढिया
Re: चार पत्नीयाँ
जनक भाई, मै आपके लेख निरंतर पदता हू. आपका रह लेख दिल की गहराइ को छूता है. और सोचने के लिये मजबुर कर देता है. ऐसे ही लिखते रहीये. मेरी शुभकामनाये आपके साथ है...
Re: चार पत्नीयाँ
वाकई बहुत खूब लिखा। यह दर्शन की समझ रखने वाला ही लिख सकता है। ‍तुमने हमारी आँखे खोल दी जनक। निश्चित ही तुम्हारे भीतर ही कहीं कोई अष्ट्रावक्र छिपा हुआ है, जो इस तरह की वैराग्यपूर्ण बाते भी लिखने लगे हो। वा भय्या वा।
Re: चार पत्नीयाँ
गुद वन आइ लाइक द स्टोरि कीप इट उप नंदन
Re: चार पत्नीयाँ
जनक जी आपकी कहानियाँ बहुत कुछ सिखाती है. आपकी इस कहनी ने मुझे भी बहुत कुछ सिखाया है, मेरे दिमाग के बहुत सारे जाले साफ कर दिये है. आपको धन्यवाद....
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