
आज परीक्षा का परिणाम था...वह आज बहुत खुश था क्योंकि उसको अच्छे नंबर मिले थे...उसने अपने पिता को इस बारे में बताया..
पिता ने भी कहाँ बेटे तु जब घर पर आएंगा तब एक तौफा तुम्हारी राह देख रहाँ होंगा ...
वह घर पहुँचा...पिताजी ने उसे आँखे बंध कर के अपना एक हाथ आगे करने को कहाँ...बेटे ने सौचा कि शायद पिताजी उसे मोटर बाइक की चाबी हाथ में दे देंगे...लेकिन यह क्यां...पिताजी ने उसके हाथ मे तो 'भागवत गीता' पकडा दी..
वह बहुत निराश हुआ...उसने उसे वहीं फेंक दिया और घर छोडकर चला गया...उसने पीछे मुडकर एक बार भी अपने पिता के सामने नहीं देखा..उसका बाप उसे बेटा-बेटा कर के बुलाता रहाँ लेकिन वह कहाँ रुकने वाला था..
( इस घटना के दस साल बाद )
आज यह लडका एक बहुत बडा आदमी बन चूँका था.... उसकी शादी हो चूँकी थी... इतने सालो के बाद आज उसे अचानक अपने पिता और घर की याद आ गई .. वह अपने परिवार के साथ घर पहुँचा..लेकिन यहाँ पहुँचकर उसे मालूम हुआ कि उसके पिता की उसी दिन मृत्यु हो चूकी थी जब वह घर छोडकर गया था...
उसने अपने पिता की आखरी यादे अपने साथ ले जाने का सौचा... वह अपने पिता से जुडी सभी चीजे ईकठ्ठी करने लगा... अचानक उसके हाथ में वह 'भागवत गीता' भी आ गई जिसे वहीँ छोडकर वह घर से चला गया था...
उसने उसे उठाया...लेकिन यह क्यां उस पुस्तक में एक लिफाफा भी था...जिसे पिताजी ने उसके नाम पर लिखा था... उसने वह खोला....
प्रिय राजु...
में तुम्हे बहुत चाँहता हुँ... तुम्हारी मा के देहांत के बाद में बिल्कुल टुट चूँका था...अगर तुम नहीं होते तो शायद मेरे लिए जिवन की कोई अहेमियत नहीं होती... मेंने हमेशा तुमसे प्यार किया...कुछ दिन पहले तुमने मुजसे मोटर बाइक मांगी थी...उस दिन में इतना सक्षम नहीं था कि में तुम्हे नई मोटर बाइक खरीद के दे शकुं... लेकिन तुमने जीवन में पहली बार मुझसे कुछ मांगा था...
इसलिए में तुम्हे निराश नहीं करना चाँहता था... पैसो की जुगाड करने के लिए मेने अपनी बाकी बची हुए एक किडनी भी बेंच दी...उससे जो रुपैये मिले उससे मेने तुम्हारे लिए यह मोटर बाइक खरीदी है...जिसकी चाबी इस लिफाफे में ही है.. तुम आज घर छोडकर चले गए... लेकिन अपनी चाँबी लेना भूल गए... .
शायद यह हमारी आखरी मुलाकात थी... लेकिन फिर कभी अगर तुम्हे अपने बाप की याद आए... तो यह 'भागवत गीता' और अपनी मोटर बाइक की चाबी ले जाना मत भूलना..तुम्हारी गाडी मेने घर के पीछे वाले गोडाउन में संभालकर रखी है... .
तुम्हारा अभागा बाप.....
उसके पास बोलने के लिए कोई शब्द नहीं थे...वह बस उस 'भागवत गीता' को अपने सीने से लगाकर फुंट फुंट के रोने लगा...
(आप को यह प्रेरणास्पद कथा कैसी लगी अपनी प्रतिक्रिया अवश्य भेजे...जनक नाम तो याद रहेगा शायद... )

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