
दोनो के बिस्तर एक-दूसरे के बिल्कुल नजदीक थे... लम्बे समय तक एक साथ रहने से उनके बीच में एक गहरी दोस्ती हो गई थी...
फेफडे की बीमारी से परेशान उस सैनिक का बिस्तर अस्पताल के कर्मचारीओ ने जान बुझकर खिड़की के करीब लगाया था..
वह बाहर घटने वाले तमाम घटनाक्रम और दृश्यो को अपने साथी मित्र के साथ बांटता था...
दूसरा दोस्त जो गोली लगने से खडा भी नहीं हो पा रहा था और जिसका बिस्तर खिड़की से थोडा दूर था...वह अपने साथी द्रारा देखे गए हर दृश्यो की अपने मन में ही छबी बना लेता था... उसका साथी कभी उसे बाहर बगीचे में खिले फूलो के बारे में बताता, तो कभी एक रुठी हुई प्रेमिका को मनाते हुए प्रेमी के बारे में बताता..कभी बाहर खेलते बच्चो की शरारतो के बारे में बताता तो कभी बारीस के मौसम में आसमान में दिखने वाले ईंद्रधनुष के बारे में कहेता...
एक दिन बहार से कोई आवाज आ रही थी..... खिड़की के बाहर एक सेन्य परेड जा रही थी..जिसमे ब्यूगल बज रहे थे...जिसे सुनकर खिड़की के नजदिक वाला दोस्त बहुत खुश हुआ...उसने अपने दोस्त से भी इस बारे में बात की...अब उस दोस्त को अपने साथी मित्र की इर्षा होने लगी...
उस के मन में न चाहते हुए भी एक सवाल घुम रहा था कि '' आखिर वही क्यों सब कुछ चीजे देख रहाँ है..में क्यों नहीं देख शकता...आखिर मेरी गलती क्यां है... में भी चाहता हुँ कि मेरा भी खिड़की के नजदिक एक बिस्तर हो '' यह सोचकर उसने मन ही मन अपने दोस्त के प्रति दुश्मनी कर ली...
उस रात अचानक इस कमरे से किसी के खाँसने की बहुत आवाज आ रही थी...फेफडो की बीमारी से परेशान उस शख्स की आवाज दम घुटने के कारन चली गई थी. उसकी तडपन उसे धीरे-धीरे मौत के करीब ले जा रही थी... उसकी यह पीडा उसका दोस्त देख रहा था...लेकिन कहते है ना जब आदमी किसी से दुश्मनी मोल लेता है तो हर रिश्ता भूल जाता है..आज वह भी अपनी दोस्ती का रिश्ता भी भूल चुका था...वह जागते हुए भी सोता रहा...
थोडी देर वाद उस शख्स की सांसे रुक गई वह इस दुनिया को छोडकर चला गया था दूसरे दिन सुबह जब नर्स उसे देखने आई तो उसे सिर्फ उसका मृतदेह मिला... नर्स का कहेना था कि अगर मृतक के दोस्त ने रात को चिल्लाकर उसे सूचित किया होता तो शायद उसके दोस्त की जान बच शकती थी...क्योंकि नर्स कमरे के बाहर ही थी... ...
लेकिन वो भला नर्स को क्यों बताता...उसे तो उस शख्स से दुश्मनी थी..आज वह बहुत खुश था...क्योंकि आज उसके राश्ते का काटा निकल चूँका था... वह इसलिए खुश था क्योंकि अब अस्पताल वाले उसकी मांग पर उसके बिस्तर को खिड़की के पास लगा देने वाले थे... आखिर हुआ भी ऎसा ही..उसकी बात को मानकर अस्पताल वालो ने उसका बिस्तर खिड़की के पास रख दिया...जहाँ कभी उसके दोस्त का बिस्तर लगा हुआ करता था...
उसने अहंकार भरी निगाहो से खिड़की के बाहर देखा...लेकिन यह क्यां ? खिड़की के बाहर तो कुछ भी नहीं...वहां तो सिर्फ एक दीवार लगी हुई है......
जनु की झुबानी...

खुशीऔ को खौजना है तो सिर्फ अपने मन की खिड़की एक बार खोल के देखो...वहाँ सब कुछ है..प्यार भी है... और वफादारी भी.. जो लोग अपने मन की खिड़की नहीं खोल पाते... उन्हे सिर्फ और सिर्फ बाहर ऎक दीवार ही दिखती है...सिर्फ ऎक दीवार
यह प्रेरणादायक कथा आपको केसी लगी मुझे अवश्य अपनी प्रतिक्रिया भेजे... जनक..नाम तो याद रहेगा शायद...

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