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उदारता

यह उस समय कि बात है जब हमारे राष्ट्रपिता महत्मा गाधी 'चरखा संघ' के लिए राशि इकठ्ठा करने हर शहर में घूमते रहते थे और सभा आयोजित करते रहते थे...ऎसी ही एक सभा उनकी उडिसा राज्य के एक गाव में लगी थी...

सभा में जब गाँधीजी ने अपना वक्त्वय पूरा किया तब एक बुढी औरत उनकी और आगे बढी...वह गांधीजी को देखना चाहती थी...उनके पैर छुना चाहती थी...उस औरत के कपडे फटे हुए थे...

वहा पर मौजूद कायर्करो ने उसे रोकने का बहुत प्रयास किया...लेकिन वह सबसे लडते झगडते आखिर में गांधी के पास पहुंच ही गई...


गांधी के पास पहुँचकर उसने अपने पल्लु से लगी हुई एक गंठरी को खोला...जिस में एक तांबे का सिक्का था...उसने यह सिक्का गांधीजी के पैरो पर रखा..गांधीजी ने उस सिक्के को बडे प्यार से उठा कर साबधानी से दूसरे स्थान पर रख दिया...

उस समय चरखा संघ को मिलने वाली राशि का नेतृत्व जमनालाल बजाज के हाथो में था...उन्होने गांधीजी को हस्ते हुए कहाँ ''बापु आपने यह सिक्का मुझे संभालने के लिए क्यों नहीं दिया ? लगता है कि आपको इस सिक्का के साथ मुझ पर भरोसा नहीँ... लेकिन आप को बताना चाँहुंगा कि इस सिक्के का मूल्य हजारो से ज्यादा नहीं है.''

गांधीजी ने कहाँ...अगर आदमी के पास लाखो रुपैये है..और वो हजार दे रहा है...उसका अर्थ ज्यादा नहीं होता...यह गरीब औरत के पास अपना कहने के लिए सिर्फ यह तांबे का सिक्का है..और वह भी राजी खुशी से हमे सौंप रही है...

इससे बडी उदारता और कोन सी हो शकती है... इससे बडा त्याग और कौन कर शकता है... इसलिए में इस सिक्का का सन्मान करता हुँ..और शायद इसलिए ही मेरी नजर में इस सिक्के की किमत आप के हजारो से ज्यादा है... इसका उपयोग किसी महत्वपूर्ण कार्यो में किया जाएगा...


(आप को यह प्रेरणादायक कथा केसी लगी... अपनी प्रतिक्रिया अवश्य भेजे)

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