Web Webdunia.com नाम तो याद रहेंगा
Webdunia Portal |  Greetings |  Classifieds |  E-mail |  Take A Tour |  Font Download |  Feedback
X
Welcome, Guest  [ Portal's List |  Create Portal |  Sign In ]
 लोड हो रहा है...

• काश वह भी एक मजाक होता ........

किसी को अप्रैल फुल बनाने से पहले इसे जरुर पढ़े

हमारा भारत पश्विमी संस्कृति के रंग में दिन-ब-दिन रंगा जा रहाँ है। हम भी अब कुछ ऎसे त्योहार मनाने लगे है जिन के बारे में हमारे दादा-दादी ने कभी सुना भी नहीं था।

1-अप्रैल एक एसा ही त्योहार है। इस दिन हम कहीं सारे झुठ बोलकर लोगो को उल्लु बनाते है। लोगो की भावनाऔ के साथ खिलवाड़ करते है। कहने के लिए तो यह एक छोटा सा मजाक होता है। सामने वाले की भावना सिर्फ मजाक करने की ही होती है। लेकिन कभी कभी यह मजाक हकीकत बन जाता है।

दु:ख के साथ कहेना पड़ रहाँ है कि उस समय वह हकीकत हमे तो सिर्फ और सिर्फ मजाक ही लगती है और जब हमारे सामने सच आता है तब तक बहुत देर हो चूँकि होती है।

में यहा पर मुंबई शहर का एक एसा ही किस्सा प्रस्तुत करने जा रहाँ हुँ, जो पहले तो एक पिता को मजाक लगा लेकिन जब सच सामने आया तब उनके पास आँसु बहाने के अलावा और कुछ भी नहीँ बचा था।


यह किस्सा कुछ इस प्रकार है...

''प्लीस सर, मेरी बात का विश्वास करीए आप का बेटा मर चूका है। में आपको अप्रैल फुल नहीं बना रहाँ। में सच कह रहाँ हु आखिर आप मेरी बात का विश्वास क्यों नहीं करते।''

वह कोन्स्टेबल आखिर तक यही कहता रहाँ लेकिन उस पिता को इस बात का बिलकुल भी भरोसा नहीं हुआ कि वाकैहि में यह कोन्स्टेबल सहीं बोल रहाँ था।

1- अप्रैल की सुबह से हीं सुनिल के घर में सभी लोग एक-दूसरो को अप्रैल फुल बना रहे थे। सुनिल को एक बूरी आदत थी वह हमेशा 1-अप्रैल के दिन अपने परिवारजनो और दोस्तो को अप्रैल फुल बनाता था।

आज 1 अप्रैल का दिन था। सुबह से ही उसके घर में लोगो को बेवकूफ बनाने का सिलसिला शुरु हो गया था। अपने घर के सभ्यो को बेवकूफ बनाने के बाद सुनिल अपनी मोटरसाईकल पर काम पर चला गया लेकिन रास्ते में एक बस से टकराने के कारण उसकी मृत्यु हो गई।


सुबह 9 बजे सुनिल के परिवार को एक पुलीस कोन्स्टेबल ने फॉन किया कि उनके बेटा की मार्ग अकस्मात में मृत्यु हो चूँकी है। लेकिन सुनिल के पिताजी सुशिल उस बात को महज एक मजाक मानते रहे और उन्होने हँसते हँसते यह फॉन काट दिया।

सुशिल ने फिर भी इस बात की पुष्टि करने के लिए सुनिल का मोबाईल फॉन लगाया। लेकिन नंबर बंद था। अपने बेटे की आदतो से परिचित पिता ने फिर सोचा कि उस का बेटा शायद फॉन बंद रखके सब को अप्रैल फुल बनाना चाहता है।

फिर भी एक पिता को अपने बेटे की चिंता थी। उन्होने सुनिल जहाँ पर काम कर रहा था वहाँ फॉन लगाया। सामने से सिर्फ एक ही जवाब आया कि ''सुनील तो अब तक काम पर ही नहीँ आया।''

अब सुशिल थोडे चिंतित हो गए उन्होने बारी-बारी करके सुनिल के सारे दोस्तो को फॉन लगा ड़ाले, लेकिन कहीं भी सुनिल का कोई पता नहीँ चला।

करीबन सुबह 9:30 बजे सुशिल के घर में एक फॉन रींग बजी। सामने से आवाज आई '' हेलो में रेबल पुलिस स्टेशन का सब इन्स्प्केटर जे डी कदम बोल रहा हुँ। आपके पुत्र की एक ट्रांसपोर्ट बस के साथ टकरा जाने से मृत्युं हो गई है आप फौरन पुलिस स्टेशन' आ जाए।''

यह खबर सुनकर सुशिल का लहू मानो ठंड़ा गया। वह फौरन पुलिस स्टेशन पहुंचे। फिर क्याँ होना था पूरा पुलिस स्टेशन एक पिता की करुण आक्रंदन से गुँज उठा।

यह पिता रोते रोते सिर्फ एक ही बात बोल रहाँ था '' सुनिल आज तुने मुझे क्यो अप्रैल फुल नहीँ बनाया....काश यह खबर एक मजाक होती।''


केसे हुई सुनिल की मृत्युं

मुंबई के ऎरौली में सोमवार को सुबह 8:10 मिनिट पर भारत बीजले कंपनी के पास सुनिल की मोटरसाईकल एक ट्रांसपोर्ट बस से टकरा गई थी। यह बस पनवेल की और जा रही थी।

सुनिल को गंभीर हालत में वसई स्थित नवी मुंबई म्युनिसिपल कोर्पोरेशन की अस्पताल में भर्ती कराया गयाँ लेकिन तब तक बहुत देर हो चूँकी थी सुनिल यह दुनिया छोड़्कर चल बसा था।

पुलिस ने बस ड्राईवर अरुण थोमस को पकड़ लिया है।

सुनिल अपने पीछे अपने माता पिता, पत्नी सुनिता और चार साल की बेटी सलोनी को छोड़ क्याँ है।

शायद ही अब कभी इस घर में अप्रैल फुल का त्योहार या उससे जुड़ी कोई मजाक की बाते होंगी।


आप को यह सत्य कथा कैसी लगी और 1-अप्रैल मनाने के बारे में आपके क्यां विचार है अपनी प्रतिक्रिया अवश्य भेजे।

Courtesy- Mumbai Mirror
श्रेणियाँ: करन्ट अफेर्स

 प्रतिसाद

Re: काश वह भी एक मजाक होता ........
ये बडे दु:ख कि बात हे पर ऐसे किस्से तो होते रहते हे और इसका मतलब ये नही कि हमे हसना छोड देना चाहिये अरे भाई जींंदगीमे हसी मजाक तो होना ही चाहिये वर्ना ईंसान एक मशीन बनकर रह जायेगा और ये भी एक तरीका हे हसने और खुशी मनाने का उसका मतलब ये नहि कि आपको पसंद नही तो आप अन्य पर भी थोप दो.
Re: काश वह भी एक मजाक होता ........
यह बात सही हैं कि कुछ लोग अपनी छोटी सोच के कारण मजाक को एक बहुत बड़ा ईशु बना देते हैं | जिस बात का कोई भी औचित्य नहीं होता, उस बात को इतना ब्ड़ावा देते हैं कि यह तक भूल जाते हैं कि वो किसी के दोस्त हैं या रिश्तेदार हैं| इस तरह के लोग कार्पोरेट जगत में काम तो करने लगते हैं, लेकिन उनकी छोटी सोच का नजरिया कभी नहीं बदलता | इस तरह के लोगों को या तो एक प्रोफेशनल प्लेस पर काम नहीं करना चाहिए या फिर अपनी सोच को उस प्लेस के मुताबिक बदलना चाहिए | आज समाज में ऐसे कट्टरवादी लोग हैं, जो धर्म का साथ देने का दिखावा तो करते है, लेकिन फिर भी विवाद और हिंसा को खुद ही बुलावा देते हैं और हिंसक रूप धारण कर लेते हैं |
Re: काश वह भी एक मजाक होता ........
वो कहानी तो आप सभी ने सुनी होगी जिसमें एक गरडिया चिल्लाता है भेडिआ आया, भेडिआ आया ....सही बात है मजाक कभी कभी महंगा पड जाता है.तो कभी भी इस स्तर का मजाक मत करो कि लोग वास्त्विक्क्ता होने पर भी विश्वास ना कर सके.