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• ईंसान इसे ना पढ़े।

में और मेरी पत्रकारिता (सिर्फ महापुरुषो के लिए)

-अरे यार तुने कुछ सुना क्यां ?

-क्यां ?

-आशुतोष गोवारीकर द्वारा निर्देशित फिल्म जोधा अकबर्रं के खिलाफ राजपूतों के बाद अब पशु-पक्षी प्रेमी भी लामबंद हो गए हैं।

- हाँ यार ऎसी कुछ बाते तो मेने भी सुनी है कि फिल्म में पशु-पक्षीऔ को घंटों भूखा प्यासा रखकर उनसे काम लिया गया।

बेचारे पशु-पक्षी वो तो एश्वर्या राय को अपनी पीठ पर बेठाने का ख्वाब देखकर फिल्म में काम करने को राजी हुए थे। लेकिन उनको कहाँ मालूम था कि उनकी पीठ के बदले पेट पर ही वार किया जाएंगा। फिर भी वह खुश नसीब है क्योंकि वह हाथी, उँट या घोडे तो है। और में तो कम्बक्त इँसान हूँ।


-भला ईँसान होने में क्यां नुकसान है।

- काश में ईँसान न हो के कोई हाथी, उँट याँ घोडा होता तो शायद मेरा दु:ख देखकर कोई पशु-प्रेमी संस्था मदद करने तो आ पहुंचती। मेरी आपबीती को बयां करने वाला कोई वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम भी बनता। और तो और दुनिया कि
नजरो में जो में घोडा होता तो


घोडे के रुप में शायद ''चेतक'' कहेलाता। उँट के रुप में ''रेगिस्तान का जहाज'' कहलाता। हाथी के रुप में ''देवराज इन्द्र का एरावत'' कहलाता। -

चलो गघा भी होता तो कम से कम ''कल्लु कुम्हार का गध्धराज'' तो कहलाता। पर अफसोस में तो ईसान हुँ और इंसान के रुप में आज ईंसान कहने के भी लायक नहीं रहाँ।

- क्यां दु:ख है तुम्हारा ?

- दु:ख तो कुछ भी नहीं बस थोडा भूलने की आदत हो गई है ?

- क्यां भूल जाते हो तुम ?

- अपने आप को, अपनी पहचान को, हमेशा स्वयं को पुछता हुँ कि ' में क्यां था क्यां हुँ और क्यां रहुंगा।'

दोस्त तुम्हे मालूम नहीं लेकिन अब तो में घर का ताला लगाकर चाँबी अंदर भूल जाता हुँ। कभी कभी नहाने के लिए बाथरुम के बदले टोयलेट में चला जाता हू। दो-तीन बार तो अपना घर समजकर पडोशी के घर में ही घुस गयां। एक दो बार तो घर के बहार ही सुबह सुबह झाडु लगाने लगा।

- लेकिन यार तुम तो पत्रकार हो।

-यार वही तो बात है में पत्रकार था लेकिन अब नहीं।

-क्यों ?

-पत्रकार का काम होता है समाज में घटने वाली तमाम घटनाऔ का सही चिठ्ठा बनाकर, उसमे किसी भी तरह का पक्षपात न रखकर देश के और देश के लोगो के सामने प्रस्तुत करना।

-तुम वहीं तो करते हो।

-नहीं यार अब और भी काम करने पड रहे है।

-अच्छा ऎडिटींग, पूफ्र रिडींग के अलवा और कोन कोन सें काम करते हो तुम ?

मुझे सुबह सुबह हमारे ओफिर के कर्मचारी के बच्चो को स्कूल छोडने जाना पड्ता है, बोस की बीबी को आलू-बेंगन की सब्जी बहुत पसंद है सो उनके लिए हर दिन आलू बेंगन लाना पड्ता है। ओफिस कें चौकीदार के पिताजी को हार्टएटेक की प्रोब्लम है तो उनके लिए कडवु कडियात्रु (नीम का रस) भी लाना पडता है।

ओफिस की रिसेप्निस्ट की की माताजी को मंदिर जाने का शोख है तो उनके लिए सुबह-सुबह मंदिर जाना पड्ता है और मंदिर जाने के लिए सुबह-सुबह नहाना भी पड्ता है।

- यार अच्छी बात है इसी बहाने तुम तरक्की तो कर रहे हो।

- या यार तरक्की तो मेने बहुत की है।


अब मुझे सब्जी मंडी में हर सब्जी वाला पहचानता है। यहाँ तक की आलू, बैंगन, लौकी, प्याज, और मूली का क्यां दाम चल रहा है वो भी मुझे याद है।

तुम भी सुनले बटले का दाम बढ गया है और वह 15 रुपैया प्रति किलो मील रहे है और टमाटर की तो बात ही मत करो पाँच रुपये के सिफ पाँव मतलब 20 रुपैया प्रति किलो।

मंदिर के भिखारी भी मुझे पहचान ने लगे है और पुजारी भी अब पहले से थोडा ज्यादा प्रसाद देने लगा है।

हार्टएटेक, नींद में चलने की बिमारी और पाईल्स के लिए कोन कोन सी दवाए मार्केट में है और कोन से मेडिकल मे वह ज्यादा डिस्काउन्ट मे मिलती है वह मुझे पूरी तरह मालूम है।

स्कूल में बच्चे कितने बजे छुट जाते है और बच्चो को लेने के लिए कोन कोन सी मम्मी और पापा आते है, थोडा बहुत वो भी मालूम हो गया है।

- यार तुम ने तो कुछ ज्यादा तरक्की करली है।

- सही बात है इसे तरक्की ही तो कहते है। चलो अब मेरा टाईम मत बिगाडो, मुझे फेविकोल लेने जाना है।

- अब फेविकोल की क्यां जरुरत पड गई तुम्हे।

- बोस कहते है कि ''उनका प्यारा कुत्ता अब कुछ ज्यादा ही भोकने लगा है। हर किसी को देखकर बिना बजह भोंकने लगता है। सुबह सुबह उसे दूध नहीं मिलता तो बोस का ही दिमाग खाया करता है।''


- पर फेविकोल किस लिए ?

- ताकि उसे चूँप रख शके।

जनु की झुबानी : (किसी ने सच कहाँ है कि कभी-कभी पीछले जन्म में किए गए कार्य इस जन्म में हमे बहुत सताते है।)

आपकी अच्छी- बुरी प्रतिक्रिया अबश्य भेजे हमे उसका बेशब्री से इंताजार है और हा हिंदी सुधारके पढ़े।
श्रेणियाँ: Blog

 प्रतिसाद

Re: कृपया ईंसान इसे ना ही पढ़े।
अछा लिखा है और अक्सर ऐसी लेखनी से ही कभी कभार वय्कति महान बन जाता है.
Re: ईंसान इसे ना पढ़े।
आपने वाक्य ही सत्य लिखा है...
Re: ईंसान इसे ना पढ़े।
जनु भाई, तीनों उपमाएँ आपने ऐरावत, चेतक, गधे वाली बहुत अच्छी दी हैं। आगे भी आपके कोलम की प्रतीक्षा में। आपका प्रशंसक
Re: ईंसान इसे ना पढ़े।
अच्छा लिखा है.लिखना जारी रखो लोगों को इस से कुछ ना कुछ समझने का मौका मिलता है और मिलता रहेगा.
Re: ईंसान इसे ना पढ़े।
आपने अपने लेख में हर पहलू को बहुत ही गहराई से समझाया हैं, एक सच्चाई को सबके सामने रखा हैं | इसी तरह के लेख आपकी प्रतिभा को उजागर करते हैं | आप वाकई में एक महान पत्रकार हैं |
Re: ईंसान इसे ना पढ़े।
बहुत खुब भाई! उतम लिखा है.... आपने आपने मन कीं बात कही है.....
Re: ईंसान इसे ना पढ़े।
लिखा तो अच्‍छा है, लेकिन भाषा कि अशुद्धियों से मजा किरकिरा हो जाता है। यह एक व्यंग्य है? क्या इसे रम्य रचना कह सकते है?