पत्रकार अजीत भट्टाचार्य एक मात्र नाम है जिन्होने उस घटना का रिपोर्टींग किया। वह खुद बताते है कि '30 जनवरी का वह दिन आज भी मुझे याद है उस समय में हिंदुस्तान टाईम्स में काम कर रहाँ था और हमे हमारे संपादक ने इस घटनाक्रम कें बारे में सूचित किया देवदास गाँधी (महात्मा गाँधी के बेटे) ने यह खबर दी थी।भट्टाचार्य की उमर उस समय 23 साल की थी वह कहते है कि उस समय 24 घंटे की न्युज चेनले नहीं थी ना ही कोई मोबाईल फोन फिर भी गाँधीजी की हत्यां कि खबर एक आग की तरह पुरी दुनिया में फेल गई।
यहाँ तक कि उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु घटनास्थल पर पहोंचे लोगो की भीड बीरला हाउस के पास ईकठ्ठी हो गई थी।
दूसरा नाम है प्रभुभाई पटेल 85 वर्षीय यह शख्स भी उस समय वहाँ मोजुद था जिन्होने बीरला हाउस के पास जमा हुई लोगो की भीड का पूरे दिन संभाला।'में उस समय बीरला हाउस में था मेरा काम लोगो को काबू में रखने का था। यह वहीं लोग थे जो महात्मा गाँधी की प्राथना सभा में हाजरी देने आए थे'।
गाँधीजी के नजदिकी मित्र पटेल शायद उन लोगो में से एक है जिन्होने अपनी आँख से राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या होती हुई देखी थी।
उनका कहना है कि 'हमने गोली की आवाज सुनी और गाँधीजी जमीन पर गीर पडे'।
आज पटेल और भट्टाचार्यजी अपनी अलग-अलग जिंदगी जी रहै है।
(न्युज एजन्सी की खबरो से साभार)
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