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आखिर रामू क्या जाने राम को.....।

अधूरा घड़ा हमेशा छलकता रहता हैं...

अभी एक ब्लॉग में स्व. रामानंद सागर के परिवार और धीरज कुमार के बारे में पढ़ा। हमारे एक भाई साहब ने उनके बारे में काफी कुछ लिखा है जिसमें प्रशंसा कम अपना आंतरिक रोष ज्यादा है।

स्व. रामानंद सागर आज जीवित होते तो उनके परिवार की इतनी बुराईयाँ सुनकर वो खुद भी इतना दु:खी होते और मन ही मन बोल देते कि आखिर मैंने रामायण क्यों बनाई ?

हमारे प्रिय मित्र ने तो यहाँ तक लिख दिया कि रामानंद सागर के परिवार के दिमाग में कभी रामायण से आगे कोई भी बात नही आई और धीरज कुमार तो उटपटांग सीरियलों के निर्माता है।

उनके यह विचार सुनकर मुझे गुस्सा कम हँसी ज्यादा आ रही है।

आप ने यह कहावत तो सुनी ही होंगी कि 'अधूरा घडा हमेशा छलकता रहता है' । उसी प्रकार अधूरा ज्ञान हमेशा अधूरा ही रहता है। हमारे भाई साहब ने स्व. रामानंद सागर की प्रशंसा तो कि लेकिन उनके पुत्रों के एक नए प्रयास को एक मुर्खताभरा कार्य सिद्ध कर दिया।

भैया शायद, आपको मालूम नहीं अभी तो एनडीटीवी इमेजिन पर नई रामायण के सिर्फ दो ही एपिसोड प्रसारित हुए हैं। आपने तो अभी से ही उसकी असफलता का मनघडत चिठ्ठा लोगों के सामने रख दिया। नई रामायण में तो अभी राम ने जन्म भी नही लिया और आपने तो... खैर छोडो।

भाई साहब अगर आप थोडी देर फ्री है तो थोड़ा यह लेख भी पढ़ लीजिए जिसके पढ़ने के बाद आपको और मेरे प्रिय मित्रों को पुरानी रामायण और नई रामायण के निर्माण से जुड़े कुछ तथ्यों के बारे में मालूमात हो ही जाएगी।

http://jp.mywebdunia.com/2008/01/21/1200912780000.html

मेरा रामायण के निर्माता स्व. रामानंद सागर के परिजनों और धीरज कुमार के साथ कोई आंतरिक नाता नहीं है और ना ही वो लोग मुझे उनकी सीरियलों का प्रचार करने के लिए आर्थिक सहायता करते है। मैं तो वो चीज आपके सामने प्रस्तुत करने जा रहा हूँ जो शायद आपके बुद्धिशाली दिमाग से छूट गई है। कृपया यह आर्टिकल पढ़िए। जिसमे मैंने बताया है की नई रामायण को लोगों के सामने क्यों प्रस्तुत किया गया है और आप जो क्वालिटी की बातें कर रहे हो तो मैं बताना चाहूँगा कि 6 करोड़......6 करोड़ रूपया खर्च किए है सागर आर्टस ने इस धारावाहिक के पीछे।

शायद, स्व. रामानंद सागर ने कभी स्वप्न में भी नही सोचा होगा कि उनके बेटे अपनी पिता की अमूल्य धरोहर को दोहराने के लिए इतने रुपये का खर्च करेंगे।

6 करोड़ रुपये का खर्च आखिर क्यों....?

सिर्फ और सिर्फ क्वालिटी मेन्टेन करने के लिए जो आपको चाहिए।

एक्स्ट्रा विजुअल इफेक्ट, सराउन्ड साउन्ड, क्लियर पिक्चर...इस धारावाहिक के उम्दा पहलू है जिसके लिए यह खर्च किया गया है और आप बोल रहे है कि इस धारावाहिक कि कोई क्वालिटी नहीं है।

मुझे मालूम है अरुण गोविल (राम), दीपिका चिखलिया (सीता), दारा सिंग (हनुमान), अरविंद त्रिवेदी (रावण) जैसे कलाकर ने पुरानी रामायण में अपनी उम्दा छाप छोडी थी | लेकिन भैया वह समय अलग था आज के लोगों को कुछ नया चाहिए, अगर आज आप वहीं अरुण गोविल को या फिर दारासिंग को वही भूमिका फिर से दोहराने के लिए कहेंगे तो क्याआपको नहीं लग रहा है कि राम और हनुमान कि उम्र परदे पर कुछ ज्यादा देखने को मिलेगी। कृपया उन्हें थोड़ा आराम दे और नये चहेरे को आगे बढ़ने का मौका दें।

जिस तरह पुराना फर्नीचर किसी को भी अपने घर में रखना पसंद नहीं होता उसी तरह लोग भी हर दिन कुछ नया देखना चाहते हैं।

अब थोडा यह भी पढ़ लीजिए।

>"सुख-दु:ख में कोई आये यहाँ से सुख-दुख में कोई जाये यहाँ से
चैन की बंसी कहीं बजाए गम पीछे रे सीतार...
संसार यह संसार...."


यह मुखड़ा तो शायद आपने सुना ही नही होगा मैंने सुना है हम सब ने सुना है यह धीरज कुमार की सबसे सफल सीरियल 'संसार' का मुखड़ा है जिसमे खुद धीरज कुमार ने श्रीपदा के साथ एक उत्कृष्ठ अभिनय किया था और शायद मुझसे ज्यादा आप अच्छी तरह जानते होगें (उम्र में बडे जो हैं) कि “संसार” धारावाहिक ने कितनी सफलताऐं हासिल की थी। धीरज कुमार के और भी धारावाहिक है जिन्होंने इसी प्रकार सफलता का परचम लहराया है।

और रही बात असफल धारावाहिक की तो आखिर में, मैं बताना चाहूँगा कि "यार धंधे में नफा-नुकसान तो उठाना ही पड़ता हैं।"

प्रतिसाद

Re: आखिर रामू क्या जाने राम को.....।
लेखक जी...इस लेख को पढ़कर लग रहा है कि आपकी हिंदी पूरी तरह से सुधर चुकी हैं | गुड... व्हेरी गुड...| आपने लेख में जो तुलना की है, बड़ी प्रशंसनीय हैं |
अस्वीकरण