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'नैनो का सपना' या फिर सपनो की 'नैनो'

नैनो के हो गये सब दिवाने लेकिन यह भी जान लो...

नैनो में सपना, सपना में सजना, सजना पे दिल आ गया कि सजना पे दिल आ गया ' ' लेकिन यहाँ पर तो सजना पर नहीं बल्कि नैनो पर ही सब का दिल आ गया है। जी हाँ यहाँ पर हम किसी के कजरारे नैनो की बात नहीं कर रहे।

बल्कि टाटा की लखटकिया कार नैनो की बात कर रहे हैं। आखिर आ ही गई हमारे सपनों की कार.. सब जगह पर सिर्फ नैनो की ही बोलबाला है। मीडिया की खबरों में भी सिर्फ नैनो ही छाई हुई है आखिर क्यों ना हो टाटा ने अपना वादा जो पूरा किया है। रतन टाटा ने कहा था कि मैं मध्यम वर्ग के लोगों के सपनों को साकार करना चाहता था और आखिर में वो अपने बादे पे खरे उतरे हैं। दिल्ली के ऑटो एक्सप्रेसो में आज जोर-शोर से इस कार का प्रदर्शन किया गया। आज पूरे भारत की नजर छोटी कारों पर है।

टाटा की इस छोटी कार ने न तो ओटो मोबाईल्स बिजनेस का पासा पलट दिया है बल्कि शायद प्रेट्रोल की माँग को भी बढा दिया है। अब परिस्थिति पहेले से भी ज्यादा खराब हो जायेगी हरीफाई में उतरने वाली इन कंपनियों ने अपना स्थान बरकरार रखने के लिए कारो के दामों को कल्पना से भी ज्यादा कम कर दिया है। इस साल ऐसी ही 60 नई छोटी-मोटी कारें मार्केट में आने वाली हैं जो प्रेट्रोल के दाम बढाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगी। नई कार खरीदने की लालसा रखने वाले लोग अपनी पुरानी कार बेचने लगेंगे और शायद कोई भी अब पुरानी कार खरीदने की नहीं सोचेगा क्योंकि अब 1 लाख में तो नई कारें मिलना शुरू हो गई हैं और तो और आप ही समझ लो की पुरानी कारों की रिसेल वेल्यू क्या रहेंगी। 50 हजार, 40 हजार, या 20 हजार शायद उससे भी कम। पूरानी कारे कीसी मोटरसाइकिल के दाम में दिखने लगेंगी। आप ही अंदाजा लगा शकते है की फीर भारत में कारों की संख्या कहां से कहां तक पहुच जाएगी। हर शहर में मोटरसाइकिल की तुलना में कार ज्यादा दिखने मिंलेगी।

टाटा ने वर्ष की शुरुआत में 2.5 लाख कारो का उत्पादन करने का लक्ष्यांक रखा है जो दो साल में पाँच लाख तक पहुँच जाएगा और शायद 2010 तक में इसी एवरेज से देखें तो वो दस लाख तक पहुँच जाएंगा यांनी सिर्फ टाटा की ही दस लाख कारें रोड पर दौडेंगी (यातायात के बारे में आप ही सोचना)। मान लें कि एक कार में हर दिन का (25 किलोमीटर प्रति लिटर की एवरेज से) एक लीटर पेट्रोल चाहिए तो फिर 5 लाख कारो को दिन का पाँच लाख पेट्रोल और सालाना 18,25,00000 करोड लीटर पेट्रोल चाहिए। (भारत का वार्षिक पेट्रोल व खपत 1100 करोड़ लीटर है) और जो टाटा मांग के अधीन होकर साल में दस लाख कार का निर्माण शुरू करने लगेंगी तो भारत की हर दिन की पेट्रोल की जरूरत 37 करोड लीटर (प्रत्येक दिन 1 लीटर खपत के अनुसार) से भी ज्यादा हो जाएँगी ! एक तो सिर्फ टाटा की ही हम बात कर रहै हैं।

दूसरी कार कंपनियों का क्या? वो भी प्रतिस्पर्धा में टिके रहने के लिए छोटी-बडी और कम दामों वाली कारों का निर्माण करने वाली है। उसमें शंका नहीं है कि इससे ऑटोमोबाइल्स क्षेत्र का ग्रोथ (सालाना 22 प्रतिशत) बढेंगा लेकिन पेट्रोल का क्या? भारत के लिए ये दु:ख की बात है जो 70 फीसदी कच्चे तेल का आयात करता है। भारत की पेट्रोलियम इंडस्ट्रीज के लिए भी यह दु:खभरा समाचार है क्योकिं वो एक लीटर पर 9 रुपया नुकसान झेलना पडेगा। जैसे-जैसे पेट्रोल की माँग बढ़ती जाएगी वैसे-वैसे यह नुकसान भी बढता जाएगा। सिर्फ टाटा कार से ही उनको करीबन 164 करोड़ रुपए का नुकसान सहना पडेगा। एन्जल ब्रोकिंग के एनर्जी एनालिसिस्ट रोहित नागराजन का कहना है कि या तो सरकार को उन्हें ज्यादा बांड देने पडेंगे या फिर पेट्रोल के दाम बढाने पडेंगे ' दूसरी तरफ टाटा मोटर्स ने इन बातों का खंडन किया है। एनर्जी कनसल्टंट अशोक श्रीनिवास कहते है कि कंपनी इस तरह की परिस्थिति का निर्माण करना चाहती है जहाँ पर लोग अपने खुद के वाहन पर निर्भर हो सके। कई शहरो के अध्ययन के बाद हमने हमारी शहरी यातायात नीतिया को ईस तरह से पूर्वाग्रहयुक्त बनाया है जो कार चालको का समर्थन कर सके।

(इस आर्टिकल की संख्यात्मक माहिती एजेंसी की खबरो से प्रेरणा लेकर ली गई है )
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